अरब देशों में इन दिनो एक आँधी चल रही है जिसे "जम्हूरियत" की आँधी कही जानी चाहिए| वस्तुतः यह है भी इसी के लिए| मोरक्को से लेकर ईरान तक सभी देश इसकी ज़द में आ चुके हैं. लीबिया में काफ़ी उबाल है और अभी तक इस आंदोलन ने वहाँ पे २०० से भी अधिक लोकतंत्र पसंद लोगो की जान ले ली है| स्थिति काफ़ी दुखद है और जनता त्रस्त है|
अगर अरब देशों की सरकारों पे नज़र डाले तो हमे समझ में आ जाएगा की आग की वजह क्या है और मूल कारण क्या है| अरब के लगभग सभी देशों में सत्ता परिवर्तन जिस तर्ज़ पे हुआ था वे सभी कारक सिर्फ़ सत्ता हथियाने और अपना उल्लू सीधा करने से ज़्यादा कुछ नहीं था| सत्ता परिवर्तन के कई दसक बीत जाने क बाद भी लोगो के जीवन स्तर में विशेष सुधार नहीं हुआ है| वर्तमान में लीबिया के शासक घधाफी ने लीबिया में अपने शासन के ४० वर्ष पूरे किए| मुबारक हों या तुनिशिया के सौदी अरब में बीमार पड़े राष्ट्रपति सभी ने काफ़ी दिनों तक लोगो को बेवकूफ़ बनाया और अपने खज़ाने भरे| विकास और सामाजिक सुधार से कोसो दूर इन देशों की जनता के भीतर क्रांति की आग बहुत ही लग चुकी थी जिसे छिटपुट घटनाओं ने अंजाम तक पहुँचा दिया| आबेदीन और मुबारक सत्ता से बाहर हो चुके हैं और पनाह की तलाश में हैं| बहरीन में भी लोगों ने सत्ता को चुनौती देनी शुरू कर दी है| यही हाल अल्जीरिया, जॉर्डन, सीरिया और ईरान में भी है| यमन के राष्ट्रपति अब्दुल्लाह सालेह ने भी विरोधो को देखते हुए अपने देश में सुधारों की घोषणा कर दी है|
अरब देशों में या तो सेना से लोग सत्ता में आए हैं या राजघरानो के ही लोगों ने अलग तरीक़ो से सत्ता को अपने क़ब्ज़े में लिया हुआ है| इन देशों की तेल की आमदनी कुछ लोगो के हाथों में चली जाती है| सौदी अरब को छोड़ दें तो बाकी देशो ने ना तो किसी तरह का विकास किया है और ना ही सामाजिक उत्थान के दिशा में विशेष प्रयास किया है| सीरिया और सौदी अरब को छोड़ दें तो बाकी अरब देशों में में साक्षरता दर काफ़ी अच्छी है| भ्रष्टाचार और प्रतिशत के हिसाब से भूखमरी इन देशों में काफ़ी है| अगर इन सारे तथ्यों का अद्धयन किया जाए तो जो चित्र उभरती है वो इन विद्रोहो के कारण को उजागर करती है| इन देशों में पढ़े लिखे लोग हैं लेकिन उनके लिए रोज़गार नहीं है, इन देशों में पैसा है फिर भी लोग भूखे हैं| ऐसे में लोगो की सहनशीलता ने जवाब दे दिया और आज उनको इस कगार पे ले आया जहाँ किसी के लिए भी यह कह पाना मुश्किल हो गया है कि ये देश किधर जा रहें हैं| अगर इन देशों में सत्ता परिवर्तन सही तरीके से नहीं होता है तो इन देशों में कट्टरपंथ को बढ़ावा मिलेगा जो कि सबके लिए नुकसानदेह होगा| इन सबके बीच अमरीका को भी अपनी नीतियों में बदलाव करना होगा| अभी तक की उसकी नीतियाँ इन देशों की जनता से ज़्यादा सत्ताधारी वर्ग को तरज़ीह देती थी| इन नीतियों के चलते भी इन देशों को आज विरोध का सामना करना पद रहा है| अमरीका को अपने प्रभाव का इस्तेमाल करके इन देशों में सत्ता परिवर्तन में अपनी भूमिका अदा करनी चाहिए| उसकी सकारात्मक भूमिका ही उसके हित में है|
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