Friday, February 18, 2011

गठबंधन या देश

भरस्टचार शायद अब मुद्दा नहीं रहा. छोटी राजनैतिक पार्टियाँ देश के लिए कितनी ख़तरनाक हो गयी हैं यह प्रधानमंत्री के वक्तव्य या यूँ कहें की सफाई से स्पस्ट हो गयी है. आमतौर पे इन छोटी पार्टियों से सिर्फ़ सरकार बचाने या बनाने के लिए ही गठबंधन की जाती थी लेकिन समय के साथ इन पार्टियों ने भी अपनी अहमीयत को समझा तथा अपनी राजनैतिक हैसियत को बढ़ा लिया. उनकी बढ़ी हुई हैसियत और राष्ट्रीय पार्टियों की प्रन्तो पर कमज़ोर पकड़ ने इस देश को इस मुकाम पे पहुँचा दिया जहाँ हम देख तो सब कुछ सकते हैं लेकिन कर कुछ नहीं सकते. आख़िर सवाल सत्ता में बने रहने का जो है. चाहे प्रांतीयता का उन्माद हो या भाषा संबंधी दंगे या बड़ी पार्टियों की मज़बूरी के कारण अपनी मनमानी करना इन्होने जितना देश को डूबोने में मेहनत की हैं उसका कोई मुक़ाबल नहीं कर सकता है. घोटाले तो छोड़िए आज कल तो पूरा-का-पुरा सरकारी दफ़्तर भी उनके घर पे चला जाता है. पिछले कई सालों से रेल मंत्रालय कोलकाता में स्थापित है.


२जी स्पेक्ट्रम घोटालो में जिस तरह सरकार की किरिकिरी हुई है यह सारे देश के सामने और पूरा देश यह भी देख रहा हैं की कॉंग्रेस की सहयोगी पार्टी डीमके किस कदर अपने सांसद को बचाने में लगी हुई है. ऐसे में देश की जनता यह देखना चाहेगी की प्रधानमंत्री किस प्रकार अपने धर्म का पालन करते हैं. प्रधानमंत्री भले ही मज़बूर हों लेकिन जनता उनसे उमीद करेगी की वो देश हित में दोषियो को उनके अंजाम तक पहुचाएँ. संवादाता सम्मेलन में प्रधानमंत्री ने अपने आप को भी दोषी माना हैं अतः उन्हे भी जनता का विश्वास जीतना होगा. मुद्दे बहुत हैं और इन सभी मुद्दो पे सरकार की सफाई काफ़ी देर बाद आई हैं. चाहे विदेशो में जमा काले धन का मामला हो या ताज़ातरीन इसरो घोटाला इनमे जितनी बड़ी रकम की बात कही जा रही है वो भारत जैसे देश क लिए काफ़ी मायने रखता हैं. आज देश क सामने भूखमरी, बेरोज़गारी और विकास के अलावा आंतरिक और बाहरी सुरक्षा का भी है और धन की कमी सबसे बड़ी बाधा. अगर इसी तरफ सरकारी तंत्र का दुरुपयोग होता रहा तो हम अपने लक्ष्य तक कभी नहीं पहुँच पाएँगे.

गठबंधन का धर्म देश के हित में होना चाहिए ना की इसके विरोध में. अगर यह विरोध में है तो राजनैतिक पार्टियों को विचार करना चाहिए की इसका हाल कैसे निकाले आख़िर वर्तमान स्थति के वे ही ज़िम्मेदार हैं.

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