शायद प्रधानमंत्री जी ने यह बात समझ ली है कि बगैर संयुक्त संसदीय समिति संसद का बजट सत्र चलने वाला नहीं है| मगर उनके या फिर यूँ कहें की कॉंग्रेस के इस निर्णय के पीछे की प्रेरणा शायद कुछ और रही होगी अन्यथा जिस चीज़ से परहेज़ थी उस पर बात बन कैसे गयी? जिन परिस्थतियों में समिति के गठन की घोषणा की गयी उसपर गौर करना उचित होगा और यह जानना चाहिए कि कौन से कारक इस देश में सरकारों के फ़ैसले को प्रभावित करते हैं|
तमिलनाडु और बंगाल में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं और दोनो प्रन्तो की पार्टियों के साथ कॉंग्रेस की केन्द्र में गठबंधन है| इन दोनो प्रन्तो की पार्टियों के साथ विधानसभा चुनावों में कॉंग्रेस साथ खड़ी है| इन दोनो प्रांतों में कॉंग्रेस काफ़ी कमज़ोर स्थिति में रही है| बंगाल और तमिलनाडु में कॉंग्रेस की आख़िरी सरकार कब थी यह अब तथ्य लोगो के स्मृति पटल से मिट चुकी है| मुद्दा सीट बटवारे का भी है और विधानसभा चुनावों में मज़बूत होकर उभरने का भी है| जीत सुनिस्चित करने के लिए लोगों तक कुछ ना कुछ तो पहुँचाना होगा और इसके लिए बॅजट ही सबसे उपयुक माध्यम है| ममता के हाथ में रेल है| ममता की गाड़ी पटरी पे लगती है और वाम की पटरी से उतरती| ऐसे में बस एक हल्का सा धकका ही उनके राजनैतिक प्रतिद्वंदियों को धराशायी कर सकता है| इसी धकके को हम बॅजट में देखेंगे|
इस बॅजट में सबसे बड़ी बाधा भारतीय जनता पार्टी ही थी जो की जे.पी.सी. को लेकर संसद ना चलने देने पर आमादा थी| अब जबकि सत्र शुरू हो चुका है देखना ये है कि पक्षपात के आरोपो से घिरी ममता बंगाल को कितना तोहफा देती हैं| उन्हें जिस दिन की प्रतीक्षा थी और जिस दिन के लिए उन्होने बंगाल में अपना बतौर रेलमंत्री स्थानांतरण किया था उस दिन के लिए कितने प्रदेशों की उपेक्षा की जाती है| २जी से जुड़ी जाँच लंबी चलेगी और इससे ममता को कोई ख़तरा भी नहीं हा| अतः ये संभव है की कहीं ना कहीं जे.पी.सी. का दबाव मोर्चे के अंदर से भी आया होगा| अब भारतीय जनता पार्टी चाहे जितना भी दम भर ले यह पूर्णरूप से उसकी सफलता नहीं है| और ये सरकार की निष्पक्ष जाँच में रूचि से ज़्यादा चुनावों में रूचि ज़्यादा है| सरकार की ईमानदारी तो सरकार ही जानती है लेकिन इन बातों से जनता ज़रूर दिग्भ्रमित हो जाती है कि शायद इस बार कुछ हो| इस कदम से जनता में जो उमीद जागी है उस पर खरा उतरना सरकार का काम है|
Wednesday, February 23, 2011
Monday, February 21, 2011
अरब की आग
अरब देशों में इन दिनो एक आँधी चल रही है जिसे "जम्हूरियत" की आँधी कही जानी चाहिए| वस्तुतः यह है भी इसी के लिए| मोरक्को से लेकर ईरान तक सभी देश इसकी ज़द में आ चुके हैं. लीबिया में काफ़ी उबाल है और अभी तक इस आंदोलन ने वहाँ पे २०० से भी अधिक लोकतंत्र पसंद लोगो की जान ले ली है| स्थिति काफ़ी दुखद है और जनता त्रस्त है|
अगर अरब देशों की सरकारों पे नज़र डाले तो हमे समझ में आ जाएगा की आग की वजह क्या है और मूल कारण क्या है| अरब के लगभग सभी देशों में सत्ता परिवर्तन जिस तर्ज़ पे हुआ था वे सभी कारक सिर्फ़ सत्ता हथियाने और अपना उल्लू सीधा करने से ज़्यादा कुछ नहीं था| सत्ता परिवर्तन के कई दसक बीत जाने क बाद भी लोगो के जीवन स्तर में विशेष सुधार नहीं हुआ है| वर्तमान में लीबिया के शासक घधाफी ने लीबिया में अपने शासन के ४० वर्ष पूरे किए| मुबारक हों या तुनिशिया के सौदी अरब में बीमार पड़े राष्ट्रपति सभी ने काफ़ी दिनों तक लोगो को बेवकूफ़ बनाया और अपने खज़ाने भरे| विकास और सामाजिक सुधार से कोसो दूर इन देशों की जनता के भीतर क्रांति की आग बहुत ही लग चुकी थी जिसे छिटपुट घटनाओं ने अंजाम तक पहुँचा दिया| आबेदीन और मुबारक सत्ता से बाहर हो चुके हैं और पनाह की तलाश में हैं| बहरीन में भी लोगों ने सत्ता को चुनौती देनी शुरू कर दी है| यही हाल अल्जीरिया, जॉर्डन, सीरिया और ईरान में भी है| यमन के राष्ट्रपति अब्दुल्लाह सालेह ने भी विरोधो को देखते हुए अपने देश में सुधारों की घोषणा कर दी है|
अरब देशों में या तो सेना से लोग सत्ता में आए हैं या राजघरानो के ही लोगों ने अलग तरीक़ो से सत्ता को अपने क़ब्ज़े में लिया हुआ है| इन देशों की तेल की आमदनी कुछ लोगो के हाथों में चली जाती है| सौदी अरब को छोड़ दें तो बाकी देशो ने ना तो किसी तरह का विकास किया है और ना ही सामाजिक उत्थान के दिशा में विशेष प्रयास किया है| सीरिया और सौदी अरब को छोड़ दें तो बाकी अरब देशों में में साक्षरता दर काफ़ी अच्छी है| भ्रष्टाचार और प्रतिशत के हिसाब से भूखमरी इन देशों में काफ़ी है| अगर इन सारे तथ्यों का अद्धयन किया जाए तो जो चित्र उभरती है वो इन विद्रोहो के कारण को उजागर करती है| इन देशों में पढ़े लिखे लोग हैं लेकिन उनके लिए रोज़गार नहीं है, इन देशों में पैसा है फिर भी लोग भूखे हैं| ऐसे में लोगो की सहनशीलता ने जवाब दे दिया और आज उनको इस कगार पे ले आया जहाँ किसी के लिए भी यह कह पाना मुश्किल हो गया है कि ये देश किधर जा रहें हैं| अगर इन देशों में सत्ता परिवर्तन सही तरीके से नहीं होता है तो इन देशों में कट्टरपंथ को बढ़ावा मिलेगा जो कि सबके लिए नुकसानदेह होगा| इन सबके बीच अमरीका को भी अपनी नीतियों में बदलाव करना होगा| अभी तक की उसकी नीतियाँ इन देशों की जनता से ज़्यादा सत्ताधारी वर्ग को तरज़ीह देती थी| इन नीतियों के चलते भी इन देशों को आज विरोध का सामना करना पद रहा है| अमरीका को अपने प्रभाव का इस्तेमाल करके इन देशों में सत्ता परिवर्तन में अपनी भूमिका अदा करनी चाहिए| उसकी सकारात्मक भूमिका ही उसके हित में है|
अगर अरब देशों की सरकारों पे नज़र डाले तो हमे समझ में आ जाएगा की आग की वजह क्या है और मूल कारण क्या है| अरब के लगभग सभी देशों में सत्ता परिवर्तन जिस तर्ज़ पे हुआ था वे सभी कारक सिर्फ़ सत्ता हथियाने और अपना उल्लू सीधा करने से ज़्यादा कुछ नहीं था| सत्ता परिवर्तन के कई दसक बीत जाने क बाद भी लोगो के जीवन स्तर में विशेष सुधार नहीं हुआ है| वर्तमान में लीबिया के शासक घधाफी ने लीबिया में अपने शासन के ४० वर्ष पूरे किए| मुबारक हों या तुनिशिया के सौदी अरब में बीमार पड़े राष्ट्रपति सभी ने काफ़ी दिनों तक लोगो को बेवकूफ़ बनाया और अपने खज़ाने भरे| विकास और सामाजिक सुधार से कोसो दूर इन देशों की जनता के भीतर क्रांति की आग बहुत ही लग चुकी थी जिसे छिटपुट घटनाओं ने अंजाम तक पहुँचा दिया| आबेदीन और मुबारक सत्ता से बाहर हो चुके हैं और पनाह की तलाश में हैं| बहरीन में भी लोगों ने सत्ता को चुनौती देनी शुरू कर दी है| यही हाल अल्जीरिया, जॉर्डन, सीरिया और ईरान में भी है| यमन के राष्ट्रपति अब्दुल्लाह सालेह ने भी विरोधो को देखते हुए अपने देश में सुधारों की घोषणा कर दी है|
अरब देशों में या तो सेना से लोग सत्ता में आए हैं या राजघरानो के ही लोगों ने अलग तरीक़ो से सत्ता को अपने क़ब्ज़े में लिया हुआ है| इन देशों की तेल की आमदनी कुछ लोगो के हाथों में चली जाती है| सौदी अरब को छोड़ दें तो बाकी देशो ने ना तो किसी तरह का विकास किया है और ना ही सामाजिक उत्थान के दिशा में विशेष प्रयास किया है| सीरिया और सौदी अरब को छोड़ दें तो बाकी अरब देशों में में साक्षरता दर काफ़ी अच्छी है| भ्रष्टाचार और प्रतिशत के हिसाब से भूखमरी इन देशों में काफ़ी है| अगर इन सारे तथ्यों का अद्धयन किया जाए तो जो चित्र उभरती है वो इन विद्रोहो के कारण को उजागर करती है| इन देशों में पढ़े लिखे लोग हैं लेकिन उनके लिए रोज़गार नहीं है, इन देशों में पैसा है फिर भी लोग भूखे हैं| ऐसे में लोगो की सहनशीलता ने जवाब दे दिया और आज उनको इस कगार पे ले आया जहाँ किसी के लिए भी यह कह पाना मुश्किल हो गया है कि ये देश किधर जा रहें हैं| अगर इन देशों में सत्ता परिवर्तन सही तरीके से नहीं होता है तो इन देशों में कट्टरपंथ को बढ़ावा मिलेगा जो कि सबके लिए नुकसानदेह होगा| इन सबके बीच अमरीका को भी अपनी नीतियों में बदलाव करना होगा| अभी तक की उसकी नीतियाँ इन देशों की जनता से ज़्यादा सत्ताधारी वर्ग को तरज़ीह देती थी| इन नीतियों के चलते भी इन देशों को आज विरोध का सामना करना पद रहा है| अमरीका को अपने प्रभाव का इस्तेमाल करके इन देशों में सत्ता परिवर्तन में अपनी भूमिका अदा करनी चाहिए| उसकी सकारात्मक भूमिका ही उसके हित में है|
Friday, February 18, 2011
गठबंधन या देश
भरस्टचार शायद अब मुद्दा नहीं रहा. छोटी राजनैतिक पार्टियाँ देश के लिए कितनी ख़तरनाक हो गयी हैं यह प्रधानमंत्री के वक्तव्य या यूँ कहें की सफाई से स्पस्ट हो गयी है. आमतौर पे इन छोटी पार्टियों से सिर्फ़ सरकार बचाने या बनाने के लिए ही गठबंधन की जाती थी लेकिन समय के साथ इन पार्टियों ने भी अपनी अहमीयत को समझा तथा अपनी राजनैतिक हैसियत को बढ़ा लिया. उनकी बढ़ी हुई हैसियत और राष्ट्रीय पार्टियों की प्रन्तो पर कमज़ोर पकड़ ने इस देश को इस मुकाम पे पहुँचा दिया जहाँ हम देख तो सब कुछ सकते हैं लेकिन कर कुछ नहीं सकते. आख़िर सवाल सत्ता में बने रहने का जो है. चाहे प्रांतीयता का उन्माद हो या भाषा संबंधी दंगे या बड़ी पार्टियों की मज़बूरी के कारण अपनी मनमानी करना इन्होने जितना देश को डूबोने में मेहनत की हैं उसका कोई मुक़ाबल नहीं कर सकता है. घोटाले तो छोड़िए आज कल तो पूरा-का-पुरा सरकारी दफ़्तर भी उनके घर पे चला जाता है. पिछले कई सालों से रेल मंत्रालय कोलकाता में स्थापित है.
२जी स्पेक्ट्रम घोटालो में जिस तरह सरकार की किरिकिरी हुई है यह सारे देश के सामने और पूरा देश यह भी देख रहा हैं की कॉंग्रेस की सहयोगी पार्टी डीमके किस कदर अपने सांसद को बचाने में लगी हुई है. ऐसे में देश की जनता यह देखना चाहेगी की प्रधानमंत्री किस प्रकार अपने धर्म का पालन करते हैं. प्रधानमंत्री भले ही मज़बूर हों लेकिन जनता उनसे उमीद करेगी की वो देश हित में दोषियो को उनके अंजाम तक पहुचाएँ. संवादाता सम्मेलन में प्रधानमंत्री ने अपने आप को भी दोषी माना हैं अतः उन्हे भी जनता का विश्वास जीतना होगा. मुद्दे बहुत हैं और इन सभी मुद्दो पे सरकार की सफाई काफ़ी देर बाद आई हैं. चाहे विदेशो में जमा काले धन का मामला हो या ताज़ातरीन इसरो घोटाला इनमे जितनी बड़ी रकम की बात कही जा रही है वो भारत जैसे देश क लिए काफ़ी मायने रखता हैं. आज देश क सामने भूखमरी, बेरोज़गारी और विकास के अलावा आंतरिक और बाहरी सुरक्षा का भी है और धन की कमी सबसे बड़ी बाधा. अगर इसी तरफ सरकारी तंत्र का दुरुपयोग होता रहा तो हम अपने लक्ष्य तक कभी नहीं पहुँच पाएँगे.
गठबंधन का धर्म देश के हित में होना चाहिए ना की इसके विरोध में. अगर यह विरोध में है तो राजनैतिक पार्टियों को विचार करना चाहिए की इसका हाल कैसे निकाले आख़िर वर्तमान स्थति के वे ही ज़िम्मेदार हैं.
२जी स्पेक्ट्रम घोटालो में जिस तरह सरकार की किरिकिरी हुई है यह सारे देश के सामने और पूरा देश यह भी देख रहा हैं की कॉंग्रेस की सहयोगी पार्टी डीमके किस कदर अपने सांसद को बचाने में लगी हुई है. ऐसे में देश की जनता यह देखना चाहेगी की प्रधानमंत्री किस प्रकार अपने धर्म का पालन करते हैं. प्रधानमंत्री भले ही मज़बूर हों लेकिन जनता उनसे उमीद करेगी की वो देश हित में दोषियो को उनके अंजाम तक पहुचाएँ. संवादाता सम्मेलन में प्रधानमंत्री ने अपने आप को भी दोषी माना हैं अतः उन्हे भी जनता का विश्वास जीतना होगा. मुद्दे बहुत हैं और इन सभी मुद्दो पे सरकार की सफाई काफ़ी देर बाद आई हैं. चाहे विदेशो में जमा काले धन का मामला हो या ताज़ातरीन इसरो घोटाला इनमे जितनी बड़ी रकम की बात कही जा रही है वो भारत जैसे देश क लिए काफ़ी मायने रखता हैं. आज देश क सामने भूखमरी, बेरोज़गारी और विकास के अलावा आंतरिक और बाहरी सुरक्षा का भी है और धन की कमी सबसे बड़ी बाधा. अगर इसी तरफ सरकारी तंत्र का दुरुपयोग होता रहा तो हम अपने लक्ष्य तक कभी नहीं पहुँच पाएँगे.
गठबंधन का धर्म देश के हित में होना चाहिए ना की इसके विरोध में. अगर यह विरोध में है तो राजनैतिक पार्टियों को विचार करना चाहिए की इसका हाल कैसे निकाले आख़िर वर्तमान स्थति के वे ही ज़िम्मेदार हैं.
Tuesday, February 1, 2011
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